मेरी   मोहब्बत   को    तुम    सार    दे    गये

मेरी मोहब्बत को तुम सार दे गये
जिसकी कमी थी मुझको वो प्यार दे गये

नैनों में जो राज अब तक छुपे थे
देकर मोहब्बत वो इनको पार कर गये

तेरी ही यादें ही याद रहती मुझको
जैसे महकता कोई गुलजार दे गये

बंदिशें जमाने की सारी हमने जीती थी
छीन के दिल को वो हमको हार दे गये

मेरे गीत गजलों को ऐसा रूप दे गये
छेड़ी ऐसी धुन कि दिले बेकरारी दे गये

गम के ही तो बादलों का था बसेरा मुझ पर
आये जो तुम तो खुशियाँ हजार दे गये

मन नहीं लगता

क्या करूँ दिनभर, मन नही लगता
वो तेरा फोन, अब नही लगता
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ख्वाब अब तो सारे, मर से गये है
दिल अपनी बात जो , अब नही करता
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मंदिरों ओ मस्जिदों के, चक्कर छूट गये
ख्वाइशें पूरी मेरी जो, रब नही करता
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सच कहते है लोग, हद पार कर दी है
करता तो हूँ लेकिन,सब नही करता
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मोहब्बत का मजा, उतरने लगता है
प्यार से गर कोई, जब नही लड़ता
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देते है अपने भी दगा, वक्त पर लेकिन
आदत सी हो गयी इसलिए, गम नही करता
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एक एक शब्द में तुम्हारी, सूरत दिखती थी
छुपा कर रखा तुम्हारा, वो खत नही पढ़ता
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दूर हो तुम फिर भी,आंखें नम नही करता
प्यार भी तुमसे लेकिन, कुछ कम नही करता

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

😶😶😶

अचरज है ये जिंदगी भी , कैसे ख्वाबों में उलझी है

चैन न सुख की चाँदनी , ऐसे महताबों में उलझी है

मुक्तक

वो कहते है समंदर पार की , गलियां तुम्हारी है
इस दिल मे जो धड़कती है , वो धड़कन तुम्हारी है
मगर मुश्किल बस इतनी है , इस जाहिल जमाने मे
जो किसी को रास नही आती , वो जोड़ी हमारी है

मुक्तक

समंदर की गहराइयों से , ये पैगाम आया है
जमाने से लुटे लोगों में , मेरा भी नाम आया है
मोहब्बत की है तो फिर टूट के , बिखरना भी जरूरी है
इससे बचने को न पैतरा , कोई भी काम आया है

समंदर बन गयी आँखें 

मेरे दिल की दीवारों पर तेरी तस्वीर छायी है 

हुई जो तुम जुदा जब से उदासी जमके आयी है 

अज़ीयत में तो देखो तुम ये कैसा हाल मेरा है 

समंदर बन गयी आंखें तबाही जमके आयी है